4-Day Work Week: हर सुबह अलार्म की आवाज़ और वही भागदौड़ भरी ज़िंदगी। ज़्यादातर भारतीय कर्मचारियों के लिए पांच दिन काम और दो दिन छुट्टी वाला सिस्टम सालों से चलता आ रहा है। लेकिन बदलते वक्त के साथ अब लोग सिर्फ सैलरी नहीं, बल्कि बेहतर वर्क–लाइफ बैलेंस भी चाहते हैं।
इसी वजह से भारत में भी यह सवाल तेज़ी से उठने लगा है कि क्या हमारे यहां भी चार दिन का वर्क वीक संभव है। हाल ही में इस पर सरकार की तरफ से जो जवाब आया है, उसने इस चर्चा को और भी दिलचस्प बना दिया है।
श्रम और रोजगार मंत्रालय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर साफ किया है कि नए लेबर कोड्स के तहत चार दिन का वर्क वीक मुमकिन है। इसका मतलब यह नहीं है कि सभी कर्मचारी अपने आप चार दिन ही काम करेंगे, बल्कि इसमें काम करने के घंटों का नया फॉर्मूला शामिल है।
मंत्रालय के अनुसार, अगर कोई कर्मचारी चार दिन काम करता है, तो उसे रोज़ 12 घंटे काम करना होगा और बाकी तीन दिन उसे पेड छुट्टी मिल सकती है। यानी काम के दिन कम होंगे, लेकिन रोज़ाना काम के घंटे ज्यादा।
4-Day Work Week का कॉन्सेप्ट क्या है
4-Day Work Week का विचार नया नहीं है। जापान, जर्मनी और स्पेन जैसे देशों में इस पर पहले ही प्रयोग किए जा चुके हैं। कई रिपोर्ट्स में सामने आया है कि कम काम के दिन होने से कर्मचारियों की प्रोडक्टिविटी बढ़ी है और मानसिक तनाव कम हुआ है। भारत में भी अब इसी मॉडल को लेकर चर्चा हो रही है, लेकिन यहां इसका तरीका थोड़ा अलग हो सकता है।

सरकार के मुताबिक, नए लेबर कोड्स में वर्किंग आवर्स को लेकर ज्यादा फ्लेक्सिबिलिटी दी गई है। इसका उद्देश्य यह है कि कंपनियां और कर्मचारी आपसी सहमति से काम के घंटे तय कर सकें। अगर कोई कर्मचारी चार दिन में 48 घंटे काम पूरा करता है, तो उसे कानूनी रूप से तीन दिन की छुट्टी दी जा सकती है।
क्या यह सभी कर्मचारियों पर लागू होगा
यह समझना जरूरी है कि चार दिन का वर्क वीक कोई अनिवार्य नियम नहीं है। यह एक विकल्प की तरह देखा जा रहा है। यानी कंपनियां चाहें तो इसे अपनाएं और कर्मचारी चाहें तो इस सिस्टम को चुनें। हर सेक्टर और हर नौकरी के लिए यह मॉडल सही हो, ऐसा जरूरी नहीं है। मैन्युफैक्चरिंग, आईटी, सर्विस सेक्टर और स्टार्टअप्स में इसकी संभावनाएं अलग-अलग हो सकती हैं।
इसके अलावा राज्य सरकारों और कंपनियों की नीतियां भी इसमें अहम भूमिका निभाएंगी। लेबर कोड्स केंद्र सरकार की तरफ से बनाए गए हैं, लेकिन इन्हें लागू करने का फैसला काफी हद तक राज्यों पर निर्भर करता है।
कर्मचारियों के लिए क्या फायदे हो सकते हैं
4-Day Work Week सुनने में जितना आकर्षक लगता है, उतना ही यह जिम्मेदारी भी बढ़ाता है। तीन दिन की छुट्टी मिलने से लोग अपने परिवार, सेहत और निजी रुचियों के लिए ज्यादा समय निकाल सकते हैं। इससे मानसिक थकान कम हो सकती है और काम के दौरान फोकस बढ़ सकता है।
हालांकि रोज़ 12 घंटे काम करना हर किसी के लिए आसान नहीं होगा। लंबे समय तक लगातार काम करने से शारीरिक और मानसिक थकान भी बढ़ सकती है। इसलिए यह मॉडल उन्हीं लोगों के लिए बेहतर हो सकता है जो लंबे शिफ्ट में काम करने के आदी हैं या जिनकी जॉब प्रोफाइल इसकी इजाज़त देती है।
कंपनियों का नजरिया क्या होगा
कंपनियों के लिए यह फैसला लागत और प्रोडक्टिविटी से जुड़ा है। अगर चार दिन काम करके भी आउटपुट वही रहता है या बेहतर होता है, तो यह मॉडल फायदेमंद साबित हो सकता है। कई ग्लोबल कंपनियां पहले ही फ्लेक्सिबल वर्किंग मॉडल अपना चुकी हैं, जहां कर्मचारियों को काम के घंटे चुनने की आज़ादी मिलती है।

भारत में भी धीरे-धीरे कंपनियां वर्क–लाइफ बैलेंस को अहमियत देने लगी हैं। ऐसे में आने वाले समय में कुछ सेक्टर्स में 4-Day Work Week एक प्रयोग के तौर पर शुरू हो सकता है।
Overview: भारत में 4-Day Work Week
| विषय | जानकारी |
|---|---|
| मॉडल | चार दिन काम, तीन दिन छुट्टी |
| रोज़ाना काम के घंटे | 12 घंटे |
| साप्ताहिक वर्किंग आवर्स | 48 घंटे |
| कानूनी आधार | नए लेबर कोड्स |
| सरकारी बयान | श्रम और रोजगार मंत्रालय |
| अनिवार्य या विकल्प | विकल्प के रूप में संभव |
FAQs
1. क्या भारत में 4-Day Work Week लागू हो चुका है?
नहीं, यह अभी लागू नहीं हुआ है, लेकिन नए लेबर कोड्स के तहत इसे अपनाने का विकल्प मौजूद है।
2. क्या सभी कर्मचारियों को तीन दिन की छुट्टी मिलेगी?
यह कंपनी और कर्मचारी की आपसी सहमति पर निर्भर करेगा। यह सभी पर अनिवार्य नहीं है।
3. क्या रोज़ 12 घंटे काम करना जरूरी होगा?
अगर कोई चार दिन का वर्क वीक चुनता है, तो 48 घंटे पूरे करने के लिए रोज़ 12 घंटे काम करना होगा।
4. क्या सैलरी पर कोई असर पड़ेगा?
सरकार के अनुसार, यह पेड छुट्टियों के साथ होगा, इसलिए सैलरी में कटौती नहीं होनी चाहिए।
5. भारत में यह मॉडल कब तक आ सकता है?
इसका कोई तय समय नहीं है, लेकिन आने वाले वर्षों में कुछ सेक्टर्स में इसके प्रयोग की संभावना है।
Disclaimer: यह लेख उपलब्ध सरकारी बयानों और सार्वजनिक जानकारी पर आधारित है। लेबर कोड्स की व्याख्या, राज्य स्तर पर नियम और कंपनी पॉलिसी के अनुसार नियम बदल सकते हैं। किसी भी निर्णय से पहले आधिकारिक नोटिफिकेशन और विशेषज्ञ सलाह जरूर लें।
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